नई दिल्ली2 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वकील का पेशा कंजूमर संरक्षण अधिनियम के दस्तावेज़ में मौजूद नहीं है। उनके काम की सफलता में कई कारक शामिल हैं, जिन पर उनका नियंत्रण नहीं है। इसलिए उनकी सेवाओं या पैरवी में कमी का दावा नहीं किया जा सकता।
जस्टिस बेला वकील और जस्टिस पंकज मार्शल ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट रिड्रेसल कमीशन (एनसीडीआरसी) के 2007 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि वकीलों की कंपनी कंज्यूमर डिफेंस एक्ट 1986 की धारा 2 (ओ) के तहत आते हैं।
कोर्ट ने कहा कि खराब काम की वजह से वकील कोर्ट में केस दर्ज नहीं करा सकते। वकीलों का काम दूसरे पेशे से अलग होता है। उन्हें हाई लेवल एजुकेशन, टेलीकॉम और मेंटल लेबर की जरूरत है। इसलिए, उनके साथ व्यवसायियों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है।
कोर्ट ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम शांता मामले में अपने 1996 के फैसले का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में चिकित्सा मित्रता की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस केस के अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि मेडिकल डिक्लेरेशन में काम करने वाले लोग कंज्यूमर रिवोल्यूशन एक्ट के हिस्से में आएंगे। इस अधिनियम के अंतर्गत ‘सेवाओं’ की परिभाषा में स्वास्थ्य देखभाल और चिकित्सा क्षेत्र शामिल होंगे।
कोर्ट ने कहा- कंजुमर संरक्षण अधिनियम का मूल उद्देश्य कागज को गलत व्यापार से बचाना था। ऐसा नहीं है कि कोर्ट में सभी जनरलों को शामिल करना चाहता है। आईएमए बनाम शांता जज साहब पर विचार करने की जरूरत है। इस मुद्दे को प्रमुख न्यायाधीश के सामने रखा जाना चाहिए।
