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अब बच्चों और युवाओं को साइबर बुलिंग की शिकायत के लिए किसी भी मोबाइल नंबर या पुलिस स्टेशन पर फोन करने की जरूरत नहीं है। समाधान के लिए उन्हें सिर्फ अपनी गणित की किताब खोलनी होगी।
असल में, साइबर बुलिंग को लेकर बच्चे आसानी से शिकायत नहीं कर सकते। उन्हें अपनी पहचान करने में भी दिलचस्पी होती है। इसी तरह के समाधान के लिए मध्य प्रदेश पुलिस एक नई पहल है। अब एक क्यूआर कोड का उपयोग स्कैन करके चाइल्ड बुलिंग की शिकायत कर शुल्क को स्कैन करके किया जाएगा। इसमें बच्चों की पहचान होगी सीक्रेट रैनगे।
प्रारंभिक काल के कलाकारों और अन्य शिक्षण छात्रों के नोटिस बोर्ड पर यह क्यूआर उपयोग।
बच्चों की साइबर दुकान बड़ा निवेशक
बच्चों की साइबर साईट आज के समय में एक बड़ा खतरा है। पुलिस के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती सामने आई है। स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की का इससे जुड़ा मामला हाल ही में सामने आया। उसके साथ पढ़ने वाले बच्चे ने उसे परेशान किया लेकिन स्कूल ने इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे में एक्शन फिल्म का पूरा बोझ बच्ची के किरदारों पर डाला गया।

ऐसे कई मौके सामने आए हैं जहां बच्चे गेमिंग ऐप्स पर चैट करते हैं, कॉल करते हैं। यहां हमारी उम्र में बड़े लोग खुद को बच्चों की उम्र का परामर्श देकर उनका शारीरिक शोषण करते हैं। सोशल नेटवर्किंग प्लेटफ़ॉर्म पर यह एक दूसरी समस्या सामने आती है। कम उम्र के एक के-पॉप फैन को उसके रंग और एथनिसिटी को लेकर इतना बुरा लगा कि कुछ समय बाद उसे लगा कि उसका फोन हैक हो गया है।
साइबर सेल में अधिकतर मॅकड़ी महिलाएं और बच्चे
साइबर सेल में आने वाली करीब 15 से 20% की हिस्सेदारी महिलाओं और बच्चों की है और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
प्रणय नागवंशी इन दिनों भोपाल के साइबर सेल के एसपी हैं। उन्होंने कहा कि प्रोटोटाइप में क्यूआर कोड के साथ-साथ बच्चों के नाम 1930 के बारे में भी पता होना चाहिए जहां वो ऑनलाइन मिल रही धमकियों की शिकायत कर सकते हैं। नागवंशी कहते हैं, ‘किसी ने भी शिक्षण संस्थान ने आज तक हमारे पास शिकायत दर्ज नहीं कराई है, जिसमें किसी बच्चे ने साइबर बुलिंग या शोषण झेला हो। अन्य अपराधियों की तरह साइबर अपराधियों की पोस्टिंग भी तुरंत जानी चाहिए। ‘ऐसे में ‘छात्र को अपनी सहानुभूति समझनी होगी।’
साइबर हाई जीन सीखने का समय
साइबर लॉबर्स का कहना है कि साइबर लॉबर्स का मानना है कि यह कोविड महामारी से बचाव के लिए हाथ का सामान था। हाथों का साइबर हाइजीन तो हमने सीख लिया, अब जरूरत है कि हम हाइजीन भी सीखें।
कोविड महामारी के बाद नशाखोरी में मोबाइल फोन का इस्तेमाल बढ़ गया है। इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अंतरिक्ष साइबर बच्चों के लिए एक असुरक्षित जगह बन गई है।
सोशल मीडिया पर फिल्टर वाली साइट और लाइक की चाहत के साथ-साथ इसके दूसरे आधार हैं ब्लैकमेलिंग, जल्दी शादी करने का दबाव और आत्महत्या का प्रयास। ऐसे में पेरेंट्स और स्कूल बोथियों को पढ़ाई की जरूरत है।
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