नई दिल्ली6 मिनट पहले
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उलानबटार में भारत के तीन शास्त्रज्ञों के दर्शन से उपदेश मिला।
यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, सेंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (यूनेस्को) ने रामचरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को मान्यता दी है। इन वैज्ञानिक विद्वानों को मैमोरियल ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रिजनल रजिस्टर (MOWCAP) में शामिल किया गया है।
द मैमोरियल ऑफ द वर्ल्ड (एमओडब्ल्यू) इंटरनेशनल एड दस्तावेज़ी और एलोगिक्यूटिव बोर्ड की ओर से रिकमेंड किए गए दस्तावेजों में वैश्विक महत्व और सार्वभौमिक मूल्यों का आधार इस सूची में शामिल है।
रिजनल रजिस्टर में विश्व स्तर पर पहचान बनाने में मदद करने वाले दस्तावेज़ शामिल हैं। साथ ही एक देश की संस्कृति दुनिया के कई देशों तक पहुँचती है।
38 देशों ने इन सिद्धांतों को समझाया
दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर डी आर्ट्स (आईजीएनसीए) की ओर से रीजनल रजिस्टर के लिए इनोसपोर्ट का चयन किया गया था।
उलानबतार में MOWCAP की बैठक में इन दस्तावेजों को प्रस्तुत करने वाले आईजीएनसीए कला विभाग के एचओडी प्रोफेसर राकेश चंद्र गौड़ ने बताया कि यूनेस्को के 38 सदस्य और 40 ऑब्जर्वर देशों ने इन वैज्ञानिकों के महत्व को कर्श्या सिद्धांत के रूप में पहचाना है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारतीय संस्कृति के प्रसार और संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित होगी।
आईजीएनसीए की ओर से पहली बार रिजनल रजिस्टर के लिए आवेदन भेजा गया था। जिसे दस बैठकों के बाद स्वीकार कर लिया गया।

यूनेस्को के 38 सदस्यों और 40 ऑब्जर्वर देशों ने तीन नामांकन को मंजूरी दी है।
दो संस्कृत और एक अवधी भाषा की रचना
संस्कृति मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-नाटक ने भारतीय संस्कृति और साहित्य को गहराई से प्रभावित किया है। इन वैज्ञानिक सिद्धांतों में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि भारत के बाहर के लोगों पर भी गहरा असर पड़ रहा है।
भारत की समृद्ध संस्कृति और दार्शनिक विरासत के लिए इनायत की ओर से गौरव की बात है। साथ ही यह सम्मान भारतीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में नए कदम बढ़ाने में मदद करना चाहता है।
रामचरितमानस भगवान राम के चरित्र पर आधारित धार्मिक ग्रंथ है जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में लिखा है। पंचतंत्र मूल रूप से संस्कृत भाषा की रचना है जिसमें दंत और लोक कथाएँ शामिल हैं, यह विष्णु शर्मा ने लिखा है। वहीं सहृदयलोक-लोकन की रचना लेखक आनंदवर्धन ने संस्कृत में की थी।
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