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Single Member Electoral System and Problems Arising From It | भास्कर ओपिनियन: एक सदस्यीय निर्वाचन प्रणाली के विकार और इससे उपजी समस्याएँ

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5 मिनट पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर, नेशनल भास्कर, दैनिक भास्कर

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आज़ाद भारत में कुछ मामलों में एक सचिवालय इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र प्रणाली (पहली पोस्ट डी पोस्ट) को जोड़ा गया। वो अब भी चल रही है। इसमें सर्वाधिक वोट मिलें, घोषित विजेता होता है। भले ही कुल बहुमत के प्रतिशत वोट उसके खिलाफ पड़े हों।

इस प्रणाली का विकार इस रूप में सामने आया कि जो राजनीतिक दल प्रतिशत के खाते से अल्पमत में थे, वे बहुमत के खाते से बहुमत पा गए। जो कुल मिलाकर बहुमत का प्रतिशत भी नहीं पा सके वे विजयी घोषित हो गए। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं। जैसे किस सीट पर सौ वोटर्स हैं। नब्बे प्रतिशत वोटिंग होती है अर्थात नब्बे वोट निर्माता होते हैं। कुल चार ऑर्केस्ट्रा में 22-22 वोट मिलते हैं और चौथे को 24 वोट मिलते हैं। ऐसे में 24 वोट वाला विजयी घोषित हो जाता है जबकि इस क्षेत्र के सर्वाधिक 66 वोट उसके पक्ष में नहीं हैं।

इसका कारण यह है कि 1977 में केवल 41.3 प्रतिशत वोट से भी अधिक वोट से वोट हासिल कर ली थी। 1989 में वोट और पार्टिसिपेंट्स के प्रदर्शन पर रोक लगाते हुए राष्ट्रीय मोर्चा ने अपनी सरकार बनाई। बारहवें इंजेक्शन के चुनाव में भी ऐसा हुआ। कांग्रेस को सर्वाधिक वोट मिले और भाजपा को सर्वोच्च स्थान मिला फिर भी ये दोनों ही पार्टियां सत्ता से दूर और संयुक्त मोर्चा सत्ता पर काबिज हो गईं।

किसी एक पार्टी के सुझाव में कहा गया है कि उस पार्टी की जाति के चार-छह मित्रताएं पैदा हो सकती हैं।

किसी एक पार्टी के सुझाव में कहा गया है कि उस पार्टी की जाति के चार-छह मित्रताएं पैदा हो सकती हैं।

कालांतर में राजनीतिक सिद्धांत ने भी इस प्रणाली का उपयोग अपने पक्ष में किया और आज भी कर रहे हैं। किसी एक पार्टी के सुझाव में कहा गया है कि उस पार्टी की जाति के चार-छह मित्रताएं पैदा हो सकती हैं। घोटाले के बैकाव के कारण सामने वाला जीत जाता है और घोटालेबाजों की पार्टी को हरा दिया जाता है। क्योंकि उनकी जाति के वोट जो उनसे मिलने वाले थे, वो कई विचारधाराओं में बंटे हुए होते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी शाही और कांग्रेस नेता स्प्रिंग साठे ने एक ड्राइवर्स सिस्टम के रेलवे स्टेशन से अलग होने के लिए सूची प्रणाली लागू करने की सलाह दी थी। इसमें प्रतिशत की अधिकता के आधार पर किसी भी प्रतिशत को विजयी घोषित किया जाता है। इस प्रणाली के अंतर्गत प्रतिद्वंद्वियों के निधन या त्यागपत्र या दल के चुनाव में जो प्रतिपक्षी थे, उन्हें जन प्रतिनिधि माना जाता है। इस प्रणाली के कारण प्लाज्मा और दलबदल की समस्या से सही हद तक घटक पाया जा सकता है। लेकिन अब इसे लागू करना मुश्किल ही लग रहा है।



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