Badrinath Dham: भगवान विष्णु की तपस्या से जुड़ा है बद्रीनाथ धाम, जानें नारद कुंड और पंचशिला की कहानी


Last Updated:

Badrinath Dham Darshan: बद्रीनाथ धाम सिर्फ भगवान विष्णु से ही नहीं जुड़ा है. यहां भगवान शिव के भी दर्शन होते हैं. यदि आप हिमालय के बीच स्थित बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने जा रहे हैं, तो जान लीजिए यहां से जुड़े मुख्य स्थल और इनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में.

ख़बरें फटाफट

Zoom

Badrinath Dham Darshan: उत्तराखंड के हिमालय में स्थित बद्रीनाथ धाम में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. ऊंचे बर्फीले पहाड़ों, अलकनंदा नदी और प्राकृतिक सुंदरता से घिरा ये धाम भगवान विष्णु को समर्पित है. मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु ने बद्री नारायण के रूप में तपस्या की थी. यही वजह है कि बद्रीनाथ को हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है.

यहां स्थित मंदिर के अलावा तप्त कुंड, नारद कुंड, पंचशिला और ब्रह्म कपाल जैसे कई धार्मिक स्थल भी श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं. इन स्थानों से जुड़ी पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं इस यात्रा को खास बनाती हैं. अगर आप भी बद्रीनाथ धाम जाने की योजना बना रहे हैं, तो यहां के प्रमुख तीर्थस्थलों और उनके महत्व के बारे में इस वीडियो में जान लें.

बद्रीनाथ के प्रमुख तीर्थस्थल

तप्त कुंड- बद्रीनाथ मंदिर के दर्शन से पहले श्रद्धालु तप्त कुंड में स्नान करते हैं. इसे अग्नि तीर्थ भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने और इसके बाद दान-पुण्य करने से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है. अलकनंदा नदी के निकट स्थित यह कुंड बद्रीनाथ यात्रा के प्रमुख पड़ावों में शामिल है.

नारद कुंड और पंचशिला- तप्त कुंड से कुछ दूरी पर अलकनंदा नदी के दूसरे किनारे नारद कुंड स्थित है. इसके पास पांच पवित्र शिलाएं हैं, जिन्हें नारद शिला, गरुड़ शिला, मार्कंडेय शिला, नरसिंह शिला और वराह शिला कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारद शिला पर बैठकर महर्षि नारद ने भगवान विष्णु की तपस्या की थी. वहीं, नरसिंह और वराह शिला का संबंध भगवान विष्णु के अवतारों से जोड़ा जाता है। श्रद्धालु इन शिलाओं के दर्शन और पूजा के लिए यहां आते हैं.

बद्रीनाथ मंदिर- बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु के बद्री नारायण स्वरूप को समर्पित है. मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इस क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी. गढ़वाल के शासक द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था, जबकि इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर में स्वर्ण कलश स्थापित करवाया था. मंदिर आमतौर पर साल में लगभग छह महीने ही श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुला रहता है.

ब्रह्म कपाल तीर्थ- अलकनंदा नदी के तट पर स्थित ब्रह्म कपाल पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां पितरों के निमित्त कर्मकांड करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव को ब्रह्महत्या के पाप से इसी स्थान पर मुक्ति मिली थी. इसी वजह से इस तीर्थ का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है.

About the Author

authorimg

शारदा सिंहSenior Sub Editor

शारदा सिंह एक अनुभवी लाइफस्टाइल पत्रकार हैं, जिनके पास डिजिटल मीडिया और कंटेंट लेखन के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव है. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से…

और पढ़ें



Source link

Latest articles

spot_imgspot_img

Related articles

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

spot_imgspot_img