मुंबई7 मिनट पहले
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मराठा आरक्षण की मांग का मुद्दा एक बार फिर उठ गया है। मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे फिर से आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। उनका कहना है कि अगर इस बार मराठा आरक्षण नहीं मिला तो वे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।
उन्होंने कहा, “अगर हमारी वजह पूरी नहीं हुई तो हम आने वाले विधानसभा चुनाव में सभी 288 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे। इसमें सभी जाति और धर्म के उम्मीदवार शामिल होंगे। तो इसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी। उसके बाद, सरकार के पास बात करने के लिए कोई जगह नहीं होगी।”
मनोज जरांगे पटेल जालना के अंतरवाली सैराट गांव में आमरण अनशन पर बैठे हैं। हालांकि, पुलिस ने उन्हें अनशन की अनुमति नहीं दी है। कांग्रेस चुनाव से पहले भी दो बार (20-27 जनवरी और 10-26 फरवरी) मनोज तिवारी ने भूख हड़ताल की थी। तब महाराष्ट्र सरकार ने कुछ मानक अनशन खत्म करवा दिया था।

27 जनवरी को नवी मुंबई में सीएम शिंदे ने जरांगे को अपने हाथों से जूस पिलाकर अपना अनशन खत्म कर दिया। जरांगे ने लाखों समर्थकों के साथ 20 जनवरी को जालना से विरोध मार्च शुरू किया था।
सरकार और जराओं के बीच आयकर पर बात बनी थी
1. अब तक 54 लाख लोगों के कुनबी होने का प्रमाण मिला है। उन सभी लोगों को कुनबी का कास्ट सर्टिफिकेट दिया जाएगा। जरांगे ने सरकार से 4 दिनों के भीतर सर्टिफिकेट देने की मांग की थी। सरकार ने कहा है कि प्राचीन मिलन के लिए एक समिति बनाई गई है। इसके बाद प्रमाणपत्र प्राप्त करेंगे।
2. मराठा आगंतुकों को उन 37 लाख लोगों की जानकारी दी जाएगी, जिन्हें प्रमाणपत्र दिए जा चुके हैं। राज्य सरकार ने कहा है कि जरांगे को कुछ दिनों में यह डेटा दिया जाएगा।
3. शिंदे समिति का कार्यकाल दो महीने बढ़ा दिया गया है। प्रदर्शनकारी इसे एक साल बढ़ाने की मांग कर रहे थे। प्रदर्शनकारी चाहते थे कि इस कमेटी को मराठाओं के कुनबी रिकॉर्ड की खोज जारी रखनी चाहिए। सरकार ने समिति का कार्यकाल बढ़ाने का आश्वासन दिया है।
4. आंदोलनकारियों की मांग के अनुसार, जिन लोगों का रजिस्ट्रेशन हुआ है, उनके करीबी रिश्तेदारों को भी कुनबी सर्टिफिकेट दिया जाएगा। सरकार इस संबंध में आदेश जारी करने के लिए तैयार हो गई है।
5. मराठा आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर आंदोलनकारियों पर दर्ज रिपोर्ट वापस जाएंगी। गृह विभाग ने कहा है कि तय प्रक्रिया का पालन करते हुए केस वापस लिए जाएंगे।
6. मराठाओं की मांग थी कि आरक्षण मिलने तक उनके बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाए। साथ ही आरक्षण मिलने तक सरकारी भर्तियां रोक दी जाएं या स्वच्छता सुरक्षा की जाएं। सरकार ने मांग के पहले हिस्से को नहीं माना है। राज्य सरकार सिर्फ मराठा लड़कियों को पोस्ट ग्रेजुएशन तक मुफ्त शिक्षा मुहैया कराएगी। हालाँकि, इसके लिए सरकारी निर्देश जारी नहीं किया गया है।

मराठा आरक्षण का इतिहास…
मराठा खुद को कुनबी समुदाय का उदाहरण बताते हैं। इसी के आधार पर वे सरकार से आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इसकी नींव 26 जुलाई 1902 को रखी गई थी, जब छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज और कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहूजी ने एक फरमान जारी कर कहा था कि उनके राज्य में भी सरकारी पद खाली हैं, जिनमें से 50% आरक्षण मराठा, कुनबी और अन्य पिछड़े समूहों को दिया गया था। जाण।
इसके बाद 1942 से 1952 तक बम्बई सरकार के दौरान भी मराठा समुदाय को 10 साल तक आरक्षण मिला था। लेकिन, फिर मामला ठंडा पड़ गया। आजादी के बाद मराठा आरक्षण के लिए पहला संघर्ष मजदूर नेता अन्नासाहेब पटेल ने शुरू किया। वह ही अखिल भारतीय मराठा महोत्सव की स्थापना की थी। 22 मार्च 1982 को अन्नासाहेब पाटिल ने मुंबई में मराठा आरक्षण सहित अन्य 11 ताकतों के साथ पहला मार्च निकाला था।
उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस (आई) सत्ता में थी और बाबासाहेब भोसले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। विपक्षी दल के नेता शरद पवार थे। शरद पवार तब कांग्रेस (एस) पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने आश्वासन तो दिया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इससे अन्नासभ्यता दुखी हो गई।
अगले ही दिन 23 मार्च 1982 को उन्होंने अपने सिर में गोली मारकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद राजनीति शुरू हो गई। सरकारें गिरावट-बनने लगीं और इस राजनीति में मराठा आरक्षण का मुद्दा ठंडा पड़ गया।

