नई दिल्ली2 मिनट पहले
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5 जून को एनडीए की पहली बैठक पीएम आवास में शाम 4 बजे हुई थी। इस दौरान पीएम मोदी के करीब जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार और टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू नजर आए।
पहले आम चुनाव (1952) के बाद से अब तक 72 सालों के चुनावी सफर में देश ने करीब 31 साल के गठबंधन का दौर देखा है। 2014 से 2024 तक नरेंद्र मोदी की अगवाई में एनडीए की सरकार जरूर होगी, लेकिन इसके प्रमुख घटक भाजपा ने 2014 और 2019 में क्रमश: 282 और 303 मौतें हुईं।
सरकार चलाने के लिए मोदी एनडीए के घटक दलों पर निर्भर नहीं थे। लेकिन, 2024 के चुनाव में भाजपा की 240 सीटें हो गई हैं, इसलिए इस बार भाजपा को घटक दलों पर निर्भर रहना होगा। यानी देश में एक बार फिर गठबंधन सरकार का दौर शुरू हो रहा है।
1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार पहली गठबंधन सरकार थी। इसके बाद 1989 में वीपी सिंह की अगुआई में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। उनकी सरकार के पतन के बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस के बाहर से समर्थन से सरकार गिराई थी।
1991 में कांग्रेस को 232 डायस मरे, जिसमें पीवी नरसिंह राव को कई पार्टियों के रूप में देखा गया। 1996 के चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री जरूर बने, लेकिन बहुमत नहीं बन सका। उनकी सरकार 13 दिनों में गिर गई।
इसके बाद एच डी देवेगौड़ा की अगुआई में 13 पार्टियों से मिलकर संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी, जिसे बाहर से कांग्रेस का समर्थन हासिल हुआ। 1996 से 2014 तक देश ने गठबंधन को सबसे लंबा दौर देखा। गठबंधन सहयोगियों ने आर्थिक सुधार के मामले में दिशा दिखाई, लेकिन अपने सहयोगियों को रूठने-मनाने से जुड़ी रहीं।
आखिर कैसा रहा यह अनुभव? ये सरकारें कितनी मजबूत और कितनी मजबूर थीं? देखना दिलचस्प होगा…
1. संयुक्त मोर्चा (1 जून, 1996 से 19 मार्च, 1998)
राजीव गांधी हत्याकांड में भगवान के नाम आने से शुरू हुआ ‘देवदास’ और ‘चारित्र’ घोटाले में भगवान का नाम आने से शुरू हुआ ‘देवदास’ और ‘देवदास’

1996 में नई दिल्ली में एक बैठक में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और एचडी देवगौड़ा शामिल हुए।
इस दौर में दो प्रधानमंत्री देखे गए, पहले एच डी देवेगौड़ा और फिर इंद्रकुमार गुजराल। देवेगौड़ा ने कांग्रेस के बाहर से समर्थन से बनी 13 पार्टियों की संयुक्त मोर्चा सरकार संभाली थी। इसमें जनता दल, सपा, द्रमुक, तमिलमणिला कांग्रेस, असम गण परिषद व टीडीपी प्रमुख थे।
देवेगौड़ा सरकार ने 1997 में चिदंबरम द्वारा पेश किए गए बजट में खाद, बिजली ट्रिलर और छोटे ट्रैक्टरों की खरीद पर सब्सिडी दी। आयकर की ब्याज दर 15, 30 और 40 फीसदी से 10, 20 और 30 फीसदी कर दी गई। कॉर्पोरेट टैक्स में सेस हटा दिया गया। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के लिए विनिवेश आयोग की पेशकश की गई।
देवेगौड़ा की जगह प्रधानमंत्री बनने वाले इंद्र कुमार गुजराल ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी। इसे ‘गुजराल सिद्धांत’ कहा गया। यह आज भी प्रासंगिक है।
कांग्रेस अध्यक्ष की अतिशयोक्ति ने गिराई सरकार: देवेगौड़ा की सरकारी कांग्रेस की मेहरबानी पर टिकी थी। कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी की अति महत्वाकांक्षी योजना के चलते देवेगौड़ा को एक साल पहले इस्तीफा देना पड़ा। यही हाल उनके उत्तराधिकारी इंद्र कुमार गुजराल का हुआ। इसके लिए राजीव गांधी की हत्या की जांच से जुड़े जैन आयोग की रिपोर्ट को कांग्रेस ने आधार बनाया। रिपोर्ट में घटक दल डेमके पर उंगली उठाई गई थी। वैसे सरकार के आंतरिक मामले भी कम नहीं थे। चारण घोटाले में लालू प्रसाद यादव का नाम आने पर जनता दल के भीतर से ही आवाज उठी थी।
2. रद-1 : (19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2004)
जयललिता खुद पर लगे केस नला और ममता सरकारी निगम बंद करने से रूठ गईं

ममता अपने गांव पहुंच कर पीएम मोदी को मना रही थीं। उनकी माँ से आशीर्वाद भी लिया।
भाजपा की अगुआई में बने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में दो सरकारें बनाईं। इसमें भाजपा के साथ ही अन्नाद्रमुक, बीजद, अकाली दल, भाजपा, टीएमसी और पीएमके जैसे दल शामिल थे। वाजपेयी ने ‘गठबंधन धर्म’ को महत्व दिया और सहयोगियों के साथ निष्पक्ष रुख अपनाने के साथ ही आर्थिक प्रोत्साहन को बढ़ाया।
उनकी सरकार ने दूरसंचार, बीमा क्षेत्र में सुधार किए, जिसके नतीजे आज सामने आए हैं। आईटी क्षेत्र में चमक ला दी। देश के महानगरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज योजना ने मूल थीम की दिशा में नई राह खोली।
ममता बनर्जी ने खुद कोलकाता में पीएम मोदी को मनाया जश्न: राहुल को अपनी दो मूवी फिल्में और अन्नाद्रमुक के कारण मुश्किलें आईं। प्लेटाग नेता ममता बनर्जी रेलमंत्री थीं। वह पश्चिम बंगाल के कुछ बीमार सरकारी निगमों को बंद करने से नाराज थे। ममता को मनाने से पहले वाजपेयी ने जॉर्ज फर्नांडीज को भेजा था।
फिर खुद वाजपेयी ममता से मिलने कोलकाता गए थे। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिया चाहते थे कि उनके खिलाफ दर्ज मामले में वापस जाएं। बाद में उन्होंने नौसेना प्रमुख विष्णु भागवत की टिप्पणियों को लेकर रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज को सरकार से हटाने की मांग की। मांग नहीं माने जाने पर 1999 में जयललिता ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वाजपेयी सरकार विश्वास प्रस्ताव के दौरान एक वोट से गिर गई।
3. यूपीए सरकार ( 22 मई, 2004 से 26 मई, 2014)
दो कार्यकाल पूरे हुए, लेकिन घटक दलों की खामियों से सरकार की साख चली गई

द्रमुक ने पार्टी नेता दयानिधि मारन को इस्तीफा दे दिया। राजा को संचार मंत्री बनाया गया।
मनमोहन सिंह की अगवाई में यूपीए ने 2004 से 2014 तक दो सरकारें चलाईं। कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) में कांग्रेस के साथ एनसीपी, पार्टी, लोजपा, डेमोक्रेट, टीआरएस, झामुमो जैसे दल शामिल रहे हैं। यूपीए सरकार को वामपंथियों का बाहर से समर्थन हासिल था।
यूपीए-एक सरकार में लोगों के संवैधानिक अधिकारों से संबंधित कई सुधार हुए। इसके लिए कई अहम कानून बनाए गए हैं, जिनमें शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, वन अधिकार, खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहित पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम अहम हैं।
द्रमुक अपनी मर्जी से ही बदली हुई थी मंत्री: मनमोहन सरकार पर शुरुआत से ही घटक दलों का दबाव नजर आया, जिससे कई फैसले प्रभावित हुए। टू जी स्पेक्ट्रम से संबंधित 122 लाइसेंसधारकों और कोयला खदानों के मालिकों से जुड़े कथित घोटालों से सरकार की लोकप्रियता घट गई। ऐसा कहा जाता है कि द्रमुक ने अपनी मर्जी से केंद्र में मंत्री बदला लिया।
पहले दयानिधि मारन संचार मंत्री थे। उसके स्थान पर बाद में द्रमुक के एक राजा को मंत्री बनाया गया। वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन 2004 से 2006 के दौरान तीन बार कोयला मंत्री बने, क्योंकि यह उनका पसंदीदा मंत्रालय था। यह स्थिति इसलिए बनी, क्योंकि सोरेन को कुछ पुराने मामलों के कारण मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। यूपीए-2 पर नीतिगत जड़ता के आरोप लगे और उसकी हार का यह एक बड़ा कारण भी बना।
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2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन ने 292 हारें, जो बहुमत के आंकड़े 272 से 20 ज्यादा हैं। इस जीत के बावजूद भाजपा अकेले बहुमत लाने में कामयाब नहीं हो रही है। पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान उसका गढ़ कहने वाले हिंदी बेल्ट में ही हुआ। पूरी खबर पढ़ें…
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