
प्रधानमंत्री की कुर्सी की लड़ाई
लोकसभा चुनाव: करीब दो महीने तक चले कांग्रेस चुनाव का रिजल्ट आ गया है। चुनाव आयोग की ओर से अभी तक अंतिम आंकड़े नहीं दिए गए हैं, लेकिन यह साफ हो गया है कि भाजपा अपने दम पर बहुमत में नहीं आ रही है। इस बार सरकार बनाने के लिए भाजपा को अपने सहयोगी दल पर निर्भर रहना होगा। इस बीच बड़ा सवाल यह है कि 400 के पार के नारे देने वाली पार्टियां कहां से चूक गईं? वहीं, राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी ने देश के सबसे अधिक लोकसभा वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कैसे कमाल कर दिया, जिससे देश की राजनीति ही बदल गई? आइए इस बदले राजनीति को बदलाव लाने की कोशिश करते हैं।
भाजपा बहुमत के आंकड़ों से दूर क्यों रही?
1. राहुल के साथ नहीं मिलते: बीजेपी के मतदाताओं को बूथ तक लाने में आरएसएस की अहम भूमिका रही है। इस बार के चुनावों में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने चुनावों के बीच कहा था कि जब हम कमजोर थे तो आरएसएस की जरूरत थी। आज हम खुद सक्षम है। पॉलिटिकल पंडितों का मानना है कि यह रिपोर्ट भगवान के विरोध में गई और भगवान से जुड़े लोगों को बुरा लगा। उन्होंने इस चुनाव में बढ़-चढ़ कर भाग नहीं लिया। इसका खामियाजा महाराष्ट्र से लेकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को हुआ।
2. स्थानीय मुद्दों को सुलझाना: भाजपा ने इस बार अपने चुनावी मुद्दे को स्थानीय मुद्दों में सुलझाया। प्रधानमंत्री विकसित राष्ट्र और तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का नारा देते रहे। इससे आम जनता आक्रांत नहीं हुई। भाजपा ने उम्मीदवारों के चयन में भी गलती की। कई ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया गया, जिन्हें लेकर क्षेत्र में भारी नाराजगी थी। वे अब चुनाव हार गए हैं।
3. 400 के पार का नारा पड़ा उल्टा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से 400 के पार का नारा दिया गया था। यह नारा भगवान के लिए उल्टा पड़ गया। कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल राजनीतिक पार्टी दलित वोटरों को यह योजना बनाने में कामयाबी मिल रही है कि अगर बीजेपी को 400 वोट मिले तो हम संविधान बदल देंगे। यानी लेबलों और ओबीसी को मिलने वाला आरक्षण खत्म हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा नुकसान जोड़ों को हुआ है। उत्तर प्रदेश में बीएसपी का वोट बैंक मायवती से हटकर सपा और कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में चला गया।
4. बिना टिकट के टिकट न बनाना: भाजपा में पीएम मोदी से वोटरों को कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि वे अपने क्षेत्र के नेताओं से प्यार जरूर करते थे। दो बार से जीत रहे सरदारों को फिर से टिकट दिया गया। जनता में उनके लिए निराशा थी कि वो मोदी के नाम पर जीत जाते हैं लेकिन काम नहीं करते। इस बार फिर से पार्टी की ओर से जब टिकट दिया गया तो यह दुख बढ़ गया। इसके चलते भी कई परेशानियों को हार का सामना करना पड़ता है। दिल्ली में पार्टी ने अपने 6 सांसदों का टिकट काटा और रिजल्ट सबके सामने है।
5. वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होना: पिछले दो चुनावों में हिंदू और मुस्लिम वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिला था। इस बार यह देखने को नहीं मिला। इसका नुकसान सीधे तौर पर जोड़ा को हुआ है। भाजपा को उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र में इसका सबसे बड़ा नुकसान हुआ है।
राहुल-अखिलेश की जोड़ी ने कैसे किया धमाल
1.वित्तपोषण, बेरोजगारी को मुद्दे बनाने में सफल: राहुल गांधी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव इस बार के चुनाव में महंगाई और बेरोजगारी को अहम मुद्दा बनाने में सफल रहे। इसका असर उनकी कविताओं में दिखाई दिया। लाखों की संख्या में युवा अपनी जातियों में पागल। इसका फायदा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश में सपा को कांग्रेस में शामिल कर लिया गया।
2. लोकलुभावन घोषणाओं का हुआ फायदा: राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि अगर उनकी सरकार आएगी तो 30 लाख सरकारी नौकरियां भरी जाएंगी। पेपर लीक से मुक्ति कराएंगे। देश की करोड़ों गरीब महिलाओं के बैंक खाते में 8,500 रुपये जमा कराएंगे। किसानों के ऋण माफ करेंगे, किसानों को सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसका फायदा ‘भारत’ गठबंधन को मिला।
3. अग्निवीर योजना खत्म करने का ऐलान: देश के छोटे शहरों में युवाओं के बीच अग्निवीर योजनाएं लेकर भारी रोष है। इसे स्वीकार करते हुए राहुल गांधी ने घोषणा की कि अगर उनकी सरकार होगी तो वह इस योजना को खत्म कर देंगे। इसका फायदा ‘भारत’ गठबंधन को मिला।
4. जातिगत राजनीतिक साधनों में सफल: राहुल और अखिलेश की जोड़ी साथ आने से कांग्रेस और सपा उत्तर प्रदेश में जातिगत राजनीति साधनों में सफल हुए। मुस्लिम और यादवों ने रिपब्लिकन और कांग्रेस उम्मीदवारों को एकतरफा वोट दिया। वहीं, मायावती के वोट बैंक ने भी बसपा से हटकर ‘भारतीय’ गठबंधन के उम्मीदवार को वोट दिया। इसका फायदा मिला।
5. राहुल की छवि का फायदा: राहुल गांधी अपनी छवि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और न्याय यात्रा से बदलने में कामयाब रहे। उन्होंने अपनी लंबी यात्रा से जनता के बीच में एक स्थान बनाया। लोगों के बीच में इनके लेकर बनी अवधारणा खत्म हुई। इसका भी फायदा राहुल गांधी और कांग्रेस को हुआ है।
