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हिंदी पत्रकारिता दिवस क्यों मनाया जाता है? भारत में कब छपा था पहला हिंदी अखबार? पूरी जानकारी

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हिंदी पत्रकारिता दिवस क्यों मनाया जाता है भारत में पहला हिंदी अखबार कब छपा था- इंडिया टीवी हिंदी

छवि स्रोत : फेसबुक
पहली बार कब छपा था हिंदी अखबार?

“हिंदी है हम वतन, है हिंदोस्तां हमारा।” इसमें एक शब्द है हिंदी, जो हमारी मातृभाषा है। हिंदी जो भारत को एक छोर से दूसरे छोर तक जोड़ने का काम करती है। उस हिंदी को आगे बढ़ाने में अहम योगदान पत्रकारिता ने भी दिया है। हर साल 30 मई को “हिंदीपत्रकारिता दिवस” ​​मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिरकार पहली बार भारत में कब हिंदी का अखबार छपा था। हिंदी भाषा में उदन्त मार्तण्ड के नाम से पहला समाचाप पत्र 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ था। यही कारण है कि इस दिन को हिंदीपत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

कलकत्ता में छपा था पहला हिंदी अखबार

बता दें कि 30 मई को पहली बार पंडित जुगल किशोर शुक्ला ने इसे साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में शुरू किया था। इसका प्रकाशन पहली बार कलकत्ता में हुआ था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल इस साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रकाशक और संपादक थे। पंडित जुगल किशोर शुक्ल कानपुर के रहने वाले थे जो सेक्स से वकील थे। यद्यपि उनकी कर्मस्थली कलकत्ता रही। यह वह समय था जब भारत पर ब्रिटिश शासन का कब्जा था। भारतीयों के अधिकारों को कुचल दिया गया और उन्हें कुचल दिया गया। ऐसे में हिंदुस्तानियों की आवाज को उठाने के लिए पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने “उदन्त मार्तण्ड” समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया।

पहली बार 500 प्रतियां छापी गईं

पहली बार इसका प्रकाशन कलकत्ता के बड़े बाजार इलाके में अमर तल्ला लेन में किया गया। यह साप्ताहिक समाचार पत्र हर सप्ताह मंगलवार को पढकर प्रसारित होता था। बता दें कि इस समय कलकत्ता में अंग्रेजी, बांग्ला और उर्दू भाषा का प्रभाव था। बंगाल में इस समय मोदी रथ के समाचार निकाले गए थे। हिंदी भाषा का यहां एक भी अखबार नहीं था। हालाँकि 1818-19 में कलकत्ता स्कूल बुक के बांग्ला समाचार पत्र “समाचार दर्पण” के कुछ भाग हिंदी में जरूर आते थे। इसके बाद 30 मई 1826 को उदन्त मार्तण्ड को प्रकाशित किया गया। पहली बार इस समाचार पत्र के पहले अंक की 500 प्रतियां छापी गई थीं।

कुछ महीनों में बंद हो गया पहला हिंदी समाचार पत्र

बंगाल में हिंदी के समाचार पत्रों की चलन न होने के कारण समाचार पत्रों को डाक पत्र के माध्यम से भेजा जाता था। डाक लगभग बहुत अधिक होने के कारण हिंदी देशी राज्यों में इन समाचार पत्रों को सुखद आर्थिक रूप से हानिकारक था। इसके बाद पंडित जुगल किशोर ने ब्रिटिश शासन से अनुरोध किया कि वे डाक की सीमाओं में थोड़ी छूट दें, ताकि हिंदी पाठकों तक अखबार को बचाया जा सके। हालाँकि इसके लिए ब्रिटिश सरकार राजी नहीं हुई। दुर्भाग्य से, महंगे डाक-सरकारी कार्यों के कारण उदंत मार्तण्ड समाचार पत्र का प्रकाशन बहुत दिनों तक नहीं हो सका और 4 दिसंबर 1826 को ही समाचार पत्र के प्रकाशन को बंद करना पड़ा।

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