नई दिल्ली6 मिनट पहले
- लिंक

राफेल एम लड़ाकू जेट समुद्री क्षेत्र में हवाई हमले के लिए विशेष तौर पर डिजाइन किए गए हैं।
भारत नेवी के लिए फ्रांस से 26 राफेल-एम लड़ाकू जेट खरीदने की डील करने जा रहा है। इसकी चर्चा के लिए कल फ्रांस सरकार और डसॉल्ट कंपनी के अधिकारी कल भारत आएंगे। वे रक्षा मंत्रालय की अनुबंध निगोशिएशन समिति से डील को लेकर चर्चा करेंगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 22 सिंगल सीटर राफेल-एम जेट और 4 डबल ट्रेनर सीट राफेल-एम जेट को उड़ाने जाएंगे। हिंद महासागर में चीन से लड़ाई के लिए रक्षा मंत्रालय ने यह फैसला लिया है।
इस सौदे पर मोहम्मद मोदी पिछले साल फ्रांस यात्रा के दौरान रहे थे। इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने एक अनुरोध पत्र जारी किया था, जिसे फ्रांस सरकार ने दिसंबर 2023 में स्वीकार कर लिया था।
फ्रांस राफेल-एम जेट के साथ हथियार, सिम्युलेटर, क्रू के लिए प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक्स समर्थन भी मुहैया कराएगा। रक्षा मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार कल होने वाली मुठभेड़ में नेवी के अधिकारी भी शामिल रहे।
सितंबर 2016 में 59,000 करोड़ रुपये की मेगा डील के तहत भारत ने पहले ही अपने वायुसेना के लिए फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदे हैं। इस बार भारत राफेल-एम विमान खरीद रहा है।
राफेल एम लड़ाकू जेट समुद्री क्षेत्र में हवाई हमले के लिए विशेष तौर पर डिजाइन किए गए हैं। सबसे पहले स्वदेशी आरएफ कैरियर आईएनएस विक्रांत पर तैनात किया जाएगा।

राफाल एम समुद्री क्षेत्र में हवाई हमले के लिए विशेष तौर पर डिजाइनइंडिया है
रफाल का ‘एम’ वर्जन भारत में मौजूद रफाल लड़ाकू जेट से उन्नत है। आईएनएस विक्रांत से उड़ान भरने के लिए स्की जंप करते हुए ज्यादा शक्तिशाली इंजन वाला लड़ाकू जेट है। इसे ‘शॉर्ट टेक ऑफ बैट एरेस्टर लेआउट’ कहा जाता है। बहुत कम जगह पर जमीन भी कर सकते है।
राफेल के दोनों वैरिएंट में लगभग 85% घटक एक जैसे हैं। इसका मतलब यह है कि स्पेयर पार्ट्स से जुड़ी कभी भी कोई कमी या समस्या नहीं होगी।
रफाल एम के बारे में जानिये…
- यह 15.27 मी. लंबा, 10.80 मी. 5.34 मी. ऊंचा है। इसका वजन 10,600 किलो है।
- इसकी रफ्तार 1,912 KMPH है। इसकी रेंज 3700 किमी है। यह 50 हजार फीट ऊंचाई तक उड़ता है।
- यह एंटीशिप स्ट्राइक के लिए सबसे ज्यादा माना जा रहा है। इसे न्यूक्लियर प्लांट पर हमलों के नजरिए से भी डिजाइन किया गया है।

पहली उड़ान में 3 साल लग सकते हैं, वायु सेना के लिए विमान आने में 7 साल लगे थे
आईएनएस विक्रांत के समुद्री परीक्षण शुरू हो चुके हैं। वह डक से लड़ाकू ऑपरेशन परखे जाने बाकी हैं। सौदे पर मुहर लगने के कम से कम एक साल तक तकनीकी और लागत संबंधी औपचारिकताएं पूरी होंगी।
निर्यातकों का कहना है कि नौसेना के लिए रफाल इसलिए भी उपयुक्त है, क्योंकि वायुसेना रफाल के रखरखाव से संबंधित इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर चुका है। यही नौसेना के भी काम आएगा। इससे काफी पैसा बचेगा।
का कहना है कि राफाल एम की पहली खेप आने में 2-3 साल लग सकते हैं। वायु सेना के लिए 36 राफेल का सौदा 2016 में हुआ था और इसकी सजा पूरी होने में 7 साल लग गए थे।
जब नेवीगेशन के पास मिग-29 था तो राफेल-एम की जरूरत क्यों पड़ी?
आईएनएस विक्रांत के एविएशन फैसिलिटी कॉम्प्लेक्स यानी एएफसी को मिग-29 लड़ाकू विमान के लैस से तैयार किया गया था। मिग रूस में लड़ाकू विमान बने हैं, जो हाल के सालों में अपने फतवे को लेकर चर्चा में रहे हैं। इसलिए भारतीय नौसेना अगले कुछ वर्षों में अपने बेड़े से मिग फ्री को पूरी तरह से हटा रही है।
मिग में आ रही ताकतों से नौसेना को यह अहसास हुआ कि मिग की जगह उसे या तो राफेल-एम या एफ-18 सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमान की जरूरत है।
नौसेना ने पिछले साल कहा था कि विक्रांत को मिग-29 के लड़ाकू विमान से डिजाइन किया गया था, लेकिन वह इसकी जगह बेहतर डेक-बेस्ड लड़ाकू विमान की तलाश कर रही है।
इसके लिए फ्रांस के राफेल-एम और अमेरिका के बोइंग एफ-18 ‘सुपर हॉर्नेट’ लड़ाकू विमान की खरीद के लिए भी बातचीत चल रही है, लेकिन अब नौसेना फ्रांस के राफेल-एम को खरीदने पर सहमत हुई है।
उत्साहित, नौसेना ने सबसे पहले फ्रांसीसी राफेल-एम और अमेरिकी एफ -18 सुपर हॉर्नेट विमान की गोवा में परीक्षण की। टेस्टिंग के बाद नौसेना ने रक्षा मंत्रालय को बताया कि राफेल-एम उसके लिए सबसे बेहतर है। इस तरह से टेस्टिंग में राफेल-एम ने बाजी मारी और नौसेना ने इसकी डील को आगे बढ़ाया।
आने वाले सालों में नौसेना की योजना तेजस लाइट कॉम्बैट जेट के नौसेना संस्करण को विक्रांत पर तैनात करने की है। तेजस देश में बन रहा ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर प्लेन है।
हालांकि डीआरडीओ द्वारा बनाए जा रहे तेजस को तैयार होने में अभी 5-6 साल का समय लगेगा। इसकी 2030-2032 तक नईवी को मिल पाने की संभावना है।
