विशेषज्ञों के अनुसार, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित क्षेत्रों में ‘‘अनमैप्ड’’ मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक रही, जिससे मुख्य रूप से मतुआ और नामशूद्र समुदाय प्रभावित हुआ।
इस स्थिति ने बीजेपी को असहज कर दिया है, क्योंकि पहले वह कहती रही थी कि हिंदू शरणार्थियों को दस्तावेजों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब वही लोग आधार, राशन कार्ड और अन्य कागजात लेकर अपनी पहचान साबित करने के लिए कतारों में खड़े हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे मुद्दा बनाते हुए बीजेपी पर हमला बोला है। वहीं बीजेपी नेताओं का कहना है कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है और उनके नाम फिर से जोड़े जाएंगे।
फिर भी मतुआ क्षेत्रों में असमंजस और नाराजगी बनी हुई है और लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर वोट देने के बाद भी उनकी नागरिकता और मतदाता पहचान सुरक्षित नहीं है, तो उस समर्थन का आखिर क्या मतलब रह गया।





