BMW, सिमेंस… अमेरिका और चीन के बीच फंसी दिग्गज जर्मन कंपनियां! किसी एक को चुनना क्यों नामुमकिन?


बर्लिन: जर्मनी की सबसे बड़ी कंपनियां इस समय एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसी हैं जिससे बाहर निकलना लगभग नामुमकिन लग रहा है. यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और किंग्स कॉलेज लंदन की ताजा रिसर्च ने एक डरावनी हकीकत पेश की है. इसमें बताया गया है कि जर्मनी के बड़े बिजनेस घराने अमेरिका और चीन के बीच जारी प्रतिद्वंद्विता में बुरी तरह उलझ चुके हैं. जर्नल ‘रिव्यू ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिकल इकोनॉमी’ में छपी यह रिपोर्ट बताती है कि जर्मन इंडस्ट्री हर लेवल पर इन दोनों महाशक्ति देशों से जुड़ी हुई है. अब हालत यह है कि जर्मनी किसी एक का पक्ष लेने की स्थिति में भी नहीं बचा है.

जर्मन कंपनियों के लिए डिकपलिंग एक सुसाइड मिशन!

दुनिया भर में चल रहे ट्रेड वॉर और टैरिफ की लड़ाई ने ग्लोबल बिजनेस को हिलाकर रख दिया है. अमेरिका लगातार दबाव बना रहा है कि यूरोपीय देश चीन से अपने व्यापारिक रिश्ते कम करें जिसे डिकपलिंग कहा जा रहा है. हालांकि इस स्टडी से पता चलता है कि जर्मनी के लिए ऐसा करना आर्थिक रूप से आत्मघाती साबित होगा.

पिछले एक दशक में ज्यादातर बड़ी जर्मन कंपनियों ने अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने रेवेन्यू रिश्तों को और मजबूत किया है. इस वजह से वे अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा रिस्क पर हैं. डिकपलिंग का सीधा मतलब होगा सप्लाई चेन का टूटना और अरबों डॉलर का नुकसान.

कार और फार्मा सेक्टर पर कैसे मंडरा रहा है खतरा?

  • हर इंडस्ट्री की निर्भरता का तरीका अलग है लेकिन खतरा सब पर बराबर है. कार बनाने वाली कंपनियां और मशीनरी फर्म्स सबसे ज्यादा चीनी मार्केट पर टिकी हुई हैं.
  • वहीं दूसरी तरफ केमिकल और फार्मास्यूटिकल कंपनियां रिसर्च और प्रोडक्शन के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं.
  • डिजिटल, टेलीकॉम और सेमीकंडक्टर सेक्टर की हालत और भी खराब है क्योंकि वे दोनों देशों के सप्लायर्स पर निर्भर हैं.
  • सिचुएशन इतनी जटिल है कि कंपनियां एक तरफ चीनी सप्लाई चेन का इस्तेमाल कर रही हैं तो दूसरी तरफ अमेरिकी मार्केट में अपना माल बेच रही हैं.

ऐसे में किसी भी एक तरफ झुकना बिजनेस मॉडल को तबाह कर सकता है.

क्यों बर्लिन कोई ठोस रणनीति नहीं बना पा रहा है?

यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट डॉ. स्टीवन रॉल्फ का कहना है कि सिमेंस और बीएमडब्ल्यू जैसे बड़े खिलाड़ी एक ग्लोबलाइज्ड सिस्टम में फले-फूले हैं. ये कंपनियां भारी नुकसान के बिना न तो चीन को छोड़ सकती हैं और न ही अमेरिका को. यह सिर्फ किसी एक का साथ चुनने जैसा आसान मामला नहीं है. किसी भी कॉर्पोरेट ब्लॉक को यह समझ नहीं आ रहा है कि उनके असली हित कहां सुरक्षित हैं.

यही वजह है कि जर्मनी की सरकार यानी बर्लिन कोई एक स्पष्ट और ठोस रणनीति बनाने में फेल साबित हो रही है. महाशक्तियों के बीच की यह खींचतान अब सीधे तौर पर वित्तीय नुकसान में बदल रही है.

बीएमडब्ल्यू और सिमेंस के उदाहरण से समझिए असल संकट

रिसर्च में बीएमडब्ल्यू का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि कंपनी अपना एक चौथाई प्रोडक्शन चीन में करती है. वह अपनी बैटरी की जरूरतों के लिए चीन की दिग्गज कंपनी सीएटीएल (CATL) पर 1.4 बिलियन यूरो से ज्यादा निर्भर है.

वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी मार्केट उसके लिए कमाई का बड़ा जरिया है. ट्रंप प्रशासन की ओर से चीन से एक्सपोर्ट होने वाली गाड़ियों पर 10 बिलियन डॉलर से ज्यादा का टैरिफ लगाने की धमकी ने बीएमडब्ल्यू की नींद उड़ा दी है.

ट्रंप की टैरिफ धमकी से BMW के बिजनेस को बड़ा खतरा. (File Photo : Reuters)

इसी तरह सिमेंस को अपना 24% रेवेन्यू अमेरिका से मिलता है लेकिन उसके 18% सप्लायर चीन में हैं. सिमेंस के लिए डिकपलिंग का कोई भी रास्ता बिना बड़े नुकसान के मुमकिन नहीं दिखता.

क्या जर्मनी इस जाल से कभी बाहर निकल पाएगा?

किंग्स कॉलेज लंदन के डॉ. जोसेफ बैनेस का मानना है कि अमेरिका और चीन के ट्रेड वॉर ने जर्मनी ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर दी हैं. जर्मनी की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वह न तो किसी एक सुपरपावर के साथ पूरी तरह खड़ा हो सकता है और न ही दोनों के बीच कोई बैलेंस बना पा रहा है.

यह रिसर्च पहली बार दिखाती है कि कैसे जर्मन कंपनियां दोनों तरफ से दबाव और जबरदस्ती का शिकार हो रही हैं. आने वाले समय में अगर तनाव और बढ़ता है तो जर्मनी की बड़ी कंपनियों को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बेहद कड़े और दर्दनाक फैसले लेने पड़ सकते हैं.



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