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- तारिक रहमान 17 साल विदेश में रहने के बाद बांग्लादेश के पीएम बनेंगे; प्रोफ़ाइल
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बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी को भारी बहुमत मिलने के बाद पार्टी के गरीबी तारिक रहमान 17 फरवरी को प्रधानमंत्री की शपथ लेने वाले हैं।
1971 में बांग्लादेश में पाकिस्तान से आज़ाद आज़ाद की लड़ाई के 6 साल बाद, उनके भाई और माँ सहित जिया परिवार के सभी लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। बीएनपी तारिक ने बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में सबसे कम उम्र के कैदी की कहानी बताई है।

लॉ की पढ़ाई छोड़ बिजनेस में बदलाव हुआ
तारिक ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई ढिकाका में की और बच्चों के लिए स्कूल बीएएफ शाहीन कॉलेज से शुरू किया। फिर सेंट जोसेफ हायर्स स्कूल और फिर ढाका रेजीडेन्सियल मॉडल कॉलेज से ऑक्सफोर्ड स्कूल फार्मेसी और फिर एडमजी कैंटनमेंट कॉलेज से हायर्स एनआईएसहाय पुरा।
1985-86 में ढाका यूनिवर्सिटी में पहले लॉ डिपार्टमेंट में दाखिला लिया, फिर इंटरनेशनल रिलेशन्स में शिफ्ट हो गए, लेकिन दूसरे साल 1987 में पढ़ाई छोड़ दी और टेक्सटाइल और एनीमेशन बिजनेस में चले गए।
सत्ता के आंदोलन के खिलाफ इरशाद की निरंकुश रैली
तारिक एक राजनीतिक परिवार से मिले थे, इसलिए बचपन से ही उनकी रुचि राजनीति और सामाजिक में रही। उनके पिता जिया-उर-रहमान बांग्लादेश सेना के अधिकारी थे और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ शामिल थे।
पिता के युद्ध के दिनों से प्रेरित होकर उनके अंदर देश सेवा की भावना मजबूत हुई। 1988 में वे अपनी मां रेखा जिया के साथ मोहम्मद इरशाद की निरंकुश सरकार के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे।
बिजनेस के साथ राजनीति में भी सक्रिय
तारिक टेक्सटाइल और एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री में एक सफल स्टार्टअप। 1988 में वे बीएनपी पार्टी के प्राइमरी सदस्य बने और बोगरा के गबताली में काम करने लगे।
1991 और 1996 के चुनावों में उन्होंने अपनी मां के लिए प्रचार किया। 2001 से 2006 तक बीएनपी सरकार के दौरान वे सक्रिय रहे, लेकिन कोई सरकारी पद नहीं लिया।
वे जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने में लगे रहे। गाँव गाँव के लोगों की समस्या की सूची और विकास के काम करते थे, जैसे किसानों को बीज और खाद बाँटना और गरीबी कार्यक्रम चलाना। वे पर्यावरण, युवा प्रशिक्षण और आईटी जैसे क्षेत्रों में भी खास रुचि रखते थे।
इलाज के लिए लंदन गया और 17 साल तक वापस नहीं आया
7 मार्च 2007 को चुनाव की तैयारी के दौरान सेना के महामहिम सरकार ने उन पर लगाम लगाने का आरोप लगाया। वे 18 महीने जेल में रहे, जहां उन्हें बिजली के झटके जैसे यातनाएं दी गईं।
3 सितंबर 2008 को वे रिहायश में जमानत पर छूट गए और 11 सितंबर 2008 को इलाज के लिए लंदन चले गए। 2008 से 2025 तक वे लंदन के किंग्स्टन सबर्ब में रहे। वहां वे अपनी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान और बेटी जमामा रहमान के साथ रहते थे। प्रियंका की चोट के कारण उनका इलाज चल रहा है, लेकिन वे राजनीति से जुड़े हुए हैं।
निर्वासन के दौरान वे इंटरनेट और टीवी से बांग्लादेश की खबरें देखते, अध्ययन करते और विद्वानों से बातचीत करते थे। वे दूर से ही बीएनपी का नेतृत्व कर रहे हैं। 2014 के चुनाव का बहिष्करण, 2018 में स्काइप से साक्षात्कार और पार्टी के लिए पीआर फर्म का रजिस्ट्रेशन इसी दौर में हुआ। 2018 में मां के जेल जाने के बाद वे बीएनपी के किरदार राक्षस बने।

17 साल बाद लंदन से बांग्लादेश वापसी पर ढाका के शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपनी सुरक्षा का आकलन करते हैं।
17 साल बाद फिर से कम्युनिस्ट रेशानम पर लौटें
25 दिसंबर 2025 को वे अपने परिवार के साथ बांग्लादेश से आए। जनवरी 2026 में उन्हें बीएनपी का सुपरस्टार चुना गया। फरवरी 2026 में वे बोगरा और ढेका चुनाव से निर्वाचित होकर संसद सदस्य बने। अब वे 17 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री पद पर आसीन हैं।
कहानी- नीतीश कुमार
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