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- मप्र हाईकोर्ट ने कहा, फीस महंगी लगे तो सरकारी स्कूल जाएं
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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने जबलपुर प्रशासन के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें निजी कैदियों को अधिक भुगतान करने के निर्देश दिए गए थे।
उच्च न्यायालय ने वकीलों को लॉच किए गए कहा कि उनके पास फीस तय करने और अलग-अलग निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है। यह स्कूल वाले इलेक्ट्रॉनिक्स या सोसायटी के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
कोर्ट ने कहा- पेरेन्ट्स, अनमोल कूल के बीच में पैदा हुए
कोर्ट ने आगे कहा कि जिस तरह से लोक प्रशासन ने पूरे मामले को निपटाया, उस स्कूल में संपत्ति और माता-पिता के बीच अनबन और प्रतिष्ठा पैदा हुई, जो छात्र की पढ़ाई और विरासत के लिए अच्छा नहीं है। इस मामले को 2017 के अधिनियम और 2020 के नियमों के तहत सही तरीके से संभाला जा सकता था।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायाधीश रूसिया और न्यायाधीश पिपरी मिष्ट ने अपने आदेश में कहा- ‘राज्य के अधिकारी ने बहुत बुरा काम किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया।’

जबलपुर प्रशासन ने 12 से अधिक स्कूलों को नोटिस भेजा
मामला 9 जुलाई 2024 का है, जबलपुर जिले में कुछ प्राइवेट और चर्च-प्रबंधित विद्वानों पर अधिक शुल्क वसूलने के आरोप लगे थे। इसे लेकर प्रशासन जबलपुर ने ऑर्डर जारी कर टिकटों की कीमत वापस करने का आदेश जारी किया, फीस सरंचना तय करने के साथ-साथ यूनिफॅर्म, बच्चों और स्कूल बैग के वजन पर निर्देश दिए गए थे।
अधिकांश स्कूल मिशनरी मस्जिद की
दो वंचितों से ज्यादा प्राईवेट स्कूल के जनरल ने केसन कोर्ट के खिलाफ अपील की थी। अपील आर्किटेक्ट करने वाले ज्यादातर स्कूल मिशनरी स्कूल के द्वारा संचालित किये जा रहे थे।
अपील में अपीलकर्ताओं ने उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें मध्य प्रदेश प्राइवेट स्कूल (फीस और उससे जुड़े व्यक्तियों के समूह) अधिनियम, 2017 के खंड 11 और उनसे जुड़े छात्रों के आधार पर फीस वापस लेने के निर्देश दिए गए थे।
प्रशासन पर आरोप सिद्ध नहीं हो सका
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि जिन महलों को निजी अभिलेखों की फीस अधिक दिखती है, वे अपने बच्चों को सरकारी अभिलेखों में शामिल क्यों नहीं करते।
मंगलवार को उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में साफ किया कि अधिकारी सहायक को असफल साबित कर रहे हैं। ऐसे में उनकी ओर से स्कूल प्रबंधन की ओर से कार्रवाई नहीं की गई है।
राक्षसी-कृष्ण कुमार
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