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- एमआईटी डब्ल्यूपीयू शोधकर्ताओं ने भारत के स्वच्छ ऊर्जा मिशन को बढ़ावा देने के लिए तरल हाइड्रोजन को सुरक्षित रूप से परिवहन करने का नया तरीका विकसित किया है
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एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (एमआईटी-डब्ल्यूपीयू) के वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रोनिक ट्रांसपोर्ट के लिए बेहद सुरक्षित और विकसित प्रौद्योगिकी विकसित की है, जो भारत के स्वच्छ ऊर्जा के सपने को दिशा में पूरा करना एक बड़ा कदम है, क्योंकि आने वाले समय में उद्योग को कार्बन मुक्त बनाने में ठोस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।
वाॅलीवुड की टीम ने एकल कलाकार (एलओएचसी) सिस्टम में काम करने वाले कलाकारों की भूमिका निभाई। इसके माध्यम से सामान्य तापमान और दबाव के साथ आसानी से परिवहन किया जा सकता है, जिसमें आग लगने और विस्फोट का खतरा नहीं होता है। यह नई खोज भारत में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले सबसे बड़े मसालों में से एक को दूर करती है।
इस मशीन पर, प्रो. (डॉ.) वैज्ञानिक जांचकर्ता, वैज्ञानिक कुमार सिन्हा राय ने कहा, ‘शुरुआत के 50 दिनों में हमें कोई परिणाम नहीं दिखा, पर हमने हार नहीं मानी। लगभग 10 महीने में 100 बार प्लेसमेंट के बाद हमें ऐसी बड़ी उपलब्धि हासिल हुई जो पहले कहीं नहीं मिली। काम पूरा शुरू होने से मुश्किल तो था, लेकिन इससे यह साबित हुआ कि विज्ञान में सच्चे लगन से लगातार किया गया काम हमेशा सफल होता है।’
इस इनोवेशन की शुरुआत तब हुई, जब ओम क्लीन टेक प्राइवेट लिमिटेड (ओसीपीएल) की टीम ने एक ऐसी समस्या के समाधान के लिए एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के पास प्रस्ताव रखा, जिसके हल आईआईटी समेत देश के कई बड़े संस्थान नहीं खुले थे। दुनिया में कहीं भी इसे तैयार करने का पहले से कोई लिखित तरीका मौजूद नहीं था, इसलिए रिसर्च टीम ने पूरा कॉन्सेप्ट तैयार किया और अंत तक इसे विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की।
जांचकर्ता, प्रो. (डॉ.) कैनेडीब कुमार सिन्हा राय ने शुरुआती महीनों को सब्र का इम्तिहान बताया, क्योंकि लगभग 50 दिनों के प्रयोग के बाद भी हमें कोई नतीजा नहीं मिला। लेकिन, सात्विक तरीके से सच्चे लगन के साथ की गई मेहनत का फल मिला और करीब 10 महीने में 100 बार ट्रायल करने के बाद टीम ने बड़ी उपलब्धि हासिल की। OCPL ने अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म फ़ाइल बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, इस प्रोप्राइटरी मेथड की जानकारी गोपनीयता बनाए रखेगी।
ओसीपीएल के संस्थापक, श्री सिद्धार्थ मृदि ने बताया, ‘इस इनोवेशन की शुरुआत तब हुई, जब एच2ई पावर ग्रुप की कंपनी, ओम क्लेनटेक प्राइवेट लिमिटेड (ओसीपीएल) ने एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के पास एक समाधान समस्या समाधान प्रस्तुत किया। भारत में इसे तैयार करने का पहले से कोई लिखित तरीका मौजूद नहीं होने की वजह से, रिसर्च टीम और ओसीपीएल की टीम ने मिलकर पूरा कॉन्सेप्ट तैयार किया और अंत तक की प्रक्रिया विकसित करना शुरू किया। परिवहन की दिशा में इस तरह के प्रामाणिक और सुरक्षित तरीकों को प्राप्त करना एक बड़ा कदम है, जो इनोवेटिव और सस्ता है, इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा सकता है।
इससे अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट फाइलिंग की हमारी कोशिशों को भी सूची मिल गई है। यह रिसर्च नेशनल ग्रीन इंस्ट्रक्शन और हमारा उद्देश्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत के विजन के लिए है, और OCPL इसे आगे ले जाकर विक्रेताओं के लिए एक धार्मिक उत्पाद बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार है।’
वैसे तो साधारण, स्वच्छ ऊर्जा के सबसे अच्छे विकल्प में से एक है, फिर भी बहुत अधिक विस्फोटक होना और परिवहन के लिए आवश्यक एक्सट्रीम कंडीशन की वजह से ही मूल को ऊर्जा प्रणाली में शामिल करना मुश्किल हो रहा है। सटीकता, सरलता से या तो एटमॉस्फेरिक डिग्री से सैकड़ों गुना ज्यादा हाई-प्रेशर सैंपल काम्प्रेस में जाता है, या फिर 253 डिग्री से नीचे के स्तर पर उसे रेटिंग दी जाती है। दोनों ही पोर्टफोलियो में बहुत जटिल इन्फ्रास्ट्रक्चर, बहुत ज्यादा सुरक्षा और बहुत ज्यादा जांच की बर्बादी होती है, और इन सब पर होने वाला बहुत ज्यादा खर्चा ही होता है।
MIT-WPU का LOHC इनोवेशन, दो स्टेज वाले केमिकल एप्रोच की मदद से इस समस्या को दूर किया जाता है। हाइड्रोजनीकरण चरणों में, विशेष रूप से विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया एक अलग-अलग नामों के साथ जोड़ा जाता है, जिससे यह गैस पूरी तरह से सुरक्षित रूप से बदल जाती है, जिसे रखना और कहीं भी ले जाना बेहद आसान होता है।
डीहाइड्रोजनेशन चरणों में, सूक्ष्म को अपने गंतव्य पर जारी किया जाता है, जबकि डायाफ्राम में प्रयुक्त के लिए उपलब्ध रहता है। इस प्रोटोटाइप वाले उदाहरण को जोड़ना आसान है, इसका मतलब यह है कि इसे स्थिर फुल प्लाज़ों, स्टोरेज निवेशकों और यहां तक कि मानक पाइपलाइन नेटवर्क से भी ले जाया जा सकता है, जिसमें सब पर होने वाला खर्च और परिवहन का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
लैबोरेटरी ट्रायल के दौरान मिले प्लांट से स्पष्ट है कि, अब भारत में भी LOHC तकनीक सबसे आगे विकसित हो चुकी है। एमआईटी-डब्ल्यूपीयू की टीम ने महज दो घंटे में 18 घंटे के स्टोरेज का काम पूरा किया, जो दुनिया भर की दूसरी जगह 18 घंटों के लिए तैयार किया गया। आमतौर पर इसके लिए 170 डिग्री सेल्सियस की आवश्यकता होती है, लेकिन इस प्रक्रिया में केवल 130 डिग्री सेल्सियस की आवश्यकता होती है और दबाव भी धीरे-धीरे 56 गुना कम रखा जाता है।
विशेष रूप से निर्दिष्ट प्रोटोटाइप की मदद से, केवल 15.6 लीटर के कैरियर में लगभग 11,000 लीटर का भंडारण संभव हो पाया। डीहाइड्रोजनेशन के नामांकन में, टीम ने स्टुइड्स का 86 प्रतिशत वापस हासिल करने के लिए संग्रहित किया और अब इससे बेहतर परिणाम के लिए आगे की रिसर्च जारी रखी है।
प्रो. शोधकर्ता एड डांगेर ने कहा, ‘किसी को भी अन्य भारतीयों की तरह से आसानी से ले जाने के इस तरीके से सुरक्षा और सरकारी दस्तावेजों से जुड़ी पुरानी बाधाएं अब दूर हो जाएं। यह वाॅच देश के लिए संपूर्ण इंट्रेस्ट मिशन की साख बढ़ाने वाली है, इसके साथ ही वाॅल और बड़े वैयक्तिक के लिए क्लीन-एनर्जी लॉजिस्टिक्स को नया रूप मिल सकता है।’
प्रो. डॉक्टर डांडगे, शोधकर्ता एड डॉयचर ने बताया कि यह तकनीक भारत में क्लीन एनर्जी लॉजिस्टिक्स को पूरी तरह से बदलने वाली है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि, किसी भी अन्य औद्योगिक बौद्धिकता की तरह ले जाने की क्षमता से सुरक्षा और सरकारी पुरानी से जुड़ी पुरानी बाधाएं अब दूर हैं। इस तरह, यह आने वाले समय में परिवहन और बड़े उद्यमों के लिए निश्चित रूप से आसानी से उपलब्ध होगा।
एमआईटी-डब्ल्यूपीयू की कंपनी की ओर से 350 डिग्री सेल्सियस तापमान और 200 बार तक के दबाव पर काम किया जा सकता है। लैब में मिली इस टीम को विशेषज्ञ में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए आसानी से बनाना ही इस टीम का लक्ष्य है, जिसके लिए पूरी प्रक्रिया को और बेहतर बनाया जा रहा है।
एमआईटी-डब्ल्यूपीयू में प्रोजेक्ट फेलो और पीएचडी के छात्र निशांत पटेल ने कहा, ‘इतनी बड़ी उपलब्धि देश के लिए काफी कीमती है, जिसमें काम करने का अनुभव मेरे लिए बेहद खराब है। इससे भारत के स्वच्छ-राष्ट्रीय भविष्य को नए रूप देने वाले इनोवेशन में योगदान का मेरा इरादा और मजबूत हुआ।’
इस तकनीक को विकसित करने में योगदान देने वाले, प्रोजेक्ट फेलो निशांत पटेल के लिए यह प्रोजेक्ट बेहद कठिन चल रहा है, जिससे उन्हें काफी कुछ सीखने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि देश के लिए इतनी बड़ी संख्या में काम करने से भारत के सांस्कृतिक, स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार को बढ़ावा मिला, जिससे उनका इरादा और मजबूती हुई।
