जिस तरह से ईरान ने अपने पार्स गैस ठिकानों पर इजरायली मिसाइल हमलों के बाद कतर से लेकर सऊदी अरब तक के ऊर्जा ठिकानों मतलब रिफायनरीज, तेल स्रोतों को निशाना बनाते हुए गंभीर हमले किए हैं, उससे लगता है कि ईरान इस युद्ध को लंबा खींचने जा रहा है, बेशक इस युद्ध में उसने अपने दिग्गज नेताओं को गंवा दिया है लेकिन इसके बावजूद युद्ध में वह ना केवल डटा हुआ है बल्कि इसे आसानी से तो नहीं रोकने वाला. जानते हैं क्या हैं वो पांच वजहें, जिसकी वजह से ईरान अब जान-बूझकर युद्ध को लंबा खींच रहा है.
ये युद्ध 28फरवरी को शुरू हुआ था, जब इजरायल और अमेरिका के हमलों से ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई समेत कई शीर्ष कमांडर्स औऱ नेताओं की हत्या हो गई थी. अब इस युद्ध को चलते हुए 21 दिन हो चुके हैं. सारी दुनिया पर इसका असर पड़ रहा है. ऊर्जा का गंभीर संकट नजर आने लगा है.
1. लंबे युद्ध के लिए रणनीति
ईरान ने अपनी पूरी रक्षा नीति एक लंबे युद्ध के लिए बनाई है ना कि किसी छोटे युद्ध के लिए. ईरान की विकेंद्रीकृत मोज़ेक रक्षा और चौथा उत्तराधिकारी योजना ठीक इसी मकसद के लिए बनाई गई है: इसमें बेशक नेताओं, कमांड सेंटर्स औऱ संचार व्यवस्था को नुकसान पहुंचता रहे लेकिन क्षेत्रीय और स्थानीय इकाइयों को आज़ादी से लड़ती रहेंगी. कभी भी किसी एक बड़े हमले से युद्ध को खत्म नहीं होने देंगे.
ईरान ने गंभीरता से इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका के युद्धों का गहराई से अध्ययन किया है. वो जानते थे कि छोटे युद्ध अमेरिका और इज़रायल के हाई-टेक हथियारों के पक्ष में जाते हैं, लिहाजा खुद की ताकत और हथियारों को बचाए रखते और बनाए रखते हुए लड़ाई को लंबा खींचना ही उनका मुख्य मकसद है. इस तरह समय ही उनका सबसे बड़ा हथियार बन जाता है.
क्या ईरान की जंग अमेरिका को बहुत भारी पड़ने जा रही है (AI Photo)
2. सस्ते और अलग तरह के हथियारों की मदद
सस्ते और अलग तरह के हथियार दुश्मन के पैसे और सब्र को खत्म करने का काम करते हैं. ईरान कम कीमत वाले ‘शाहिद’ ड्रोन और कम दूरी वाली मिसाइलों से छोटे-छोटे हमले करता है. अमेरिका और इज़रायल को हर हमले को रोकने के लिए लाखों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. अगर ईरान के ड्रोन और मिसाइल कुछ हजार पौंड की हैं तो अमेरिका की थाड मिसाइल की कीमत $4 मिलियन से भी ज़्यादा है. युद्ध को कुछ दिनों के बजाय हफ़्तों-महीनों तक खींचकर ईरान दुश्मन को रक्षा पर इतना ज़्यादा खर्च करने पर मजबूर कर देगा जिससे वो लंबे समय इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएं. इस तरह वह उनके हौसले को भी तोड़ देता है. अधिकारी खुले तौर पर कहते हैं: “अमेरिका के विपरीत, ईरान ने खुद को एक लंबे युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार कर रखा है.”
3. होर्मुज़ को जाम करना और खाड़ी क्षेत्र के ठिकानों पर हमला
ये दोनों काम करके ईरान खाड़ी देशों के साथ साथ दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचा रहा है. केवल 20 दिनों की लड़ाई में ही दुनिया त्राहि त्राहि कर रही है. आगे ये जारी रहा तो पता नहीं क्या होगा.
ईरान खाड़ी के अमेरिकी सहयोगी देशों जैसे कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात की तेल रिफाइनरियों और LNG केंद्रों पर हमले कर रहा है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही में रुकावट डाल रहा है. इससे दुनिया भर में आर्थिक संकट पैदा हो रहा है. इसे अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगी हमेशा के लिए बर्दाश्त नहीं कर सकते. इसकी वजह से उन्हें या तो बातचीत की मेज़ पर आना पड़ेगा या फिर भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. यह ‘थका देने वाली लड़ाई’ का बेहतरीन उदाहरण है: युद्ध को इतना महंगा बना देना कि उसे जारी रखना ही नामुमकिन हो जाए.
ईरान के साथ इजरायल और अमेरिका की जंग ने मिडिल-ईस्ट में भारी तबाही मचाई है. (रॉयटर्स)
इसी वजह से अमेरिका को 15 सालों के युद्ध के बाद वियतनाम से भाग खड़ा होना पड़ा था. आज भी इसे अमेरिका की करारी हार के तौर पर याद किया जाता है, जबकि वियतनाम उसके सामने कहीं नहीं ठहरता था लेकिन उसने छोटी और बहुत लंबी लड़ाई के जरिए अमेरिका के दांत खट्टे कर दिए.
4.अपनी शर्तों पर नया क्षेत्रीय समझौता
ईरान के बचे हुए नेता साफ कह रहे हैं कि वे तब तक लड़ते रहेंगे “जब तक दुश्मन को अपनी आक्रामकता पर सचमुच पछतावा न हो जाए”. वो ईरान की मांगों को मानने के लिए तैयार ना हो जाए यानि युद्ध का मुआवज़ा, भविष्य में कोई और हमला नहीं, नए सिरे से बने गठबंधन और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के लिए एक विशेष प्रोटोकॉल जो ईरान के हितों की रक्षा करे. साफ नजर आ रहा है कि जो लोग ये अनुमान लगा रहे हैं कि ईरान कमजोर पड़ गया है और अब लड़ाई लंबी नहीं खींच पाएगा, वो शायद ईरान को कम आंक रहे हैं और गलती कर रहे हैं.
5. राष्ट्रीय एकता बनी रहेगी
खामेनेई और अन्य शीर्ष हस्तियों के मारे जाने के बावजूद, ईरान इन मौतों के जरिए देश में एक होने का संदेश दे रहा है. इसी वजह से देश की जनता उनके साथ आ सकेगी.
ईरान ने कतर से बड़े गैस फील्ड पर किया हमला. (AI Generated)
ईरान नेतृत्व बाहरी हमलों को राष्ट्रीय गौरव का मामला बनाकर जनता को एकजुट कर रहा है, क्योंकि हार स्वीकार करने से आंतरिक विद्रोह बढ़ सकता है. इससे हिजबुल्लाह, हूती जैसे प्रॉक्सी गुटों को सक्रिय रखा जा रहा है, ताकि मिडिल ईस्ट में ईरान का प्रभुत्व बना रहे.
ट्रंप ने शुरुआती अनुमान 4-5 सप्ताह का बताया था लेकिन अब अमेरिका और इजरायल दोनों को लग रहा है कि युद्ध लंबा खींच सकता है. कुछ रिपोर्ट्स तो ये बता रही हैं कि ईरान के पास युद्ध जारी रखने लायक पर्याप्त सैन्य संसाधन बाकी हैं, भले ही अमेरिका-इज़राइल के हमलों से उसके एयर फोर्स और कई सुविधाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया हो.
ईरान के पास मौजूदा ताकत
– ईरान के पास करीब 6.1 लाख सक्रिय सैनिक, 3.5 लाख रिजर्व और 2.2 लाख पैरामिलिट्री फोर्स बची है. आईआरजीसी यानि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स सबसे ताकतवर इकाई है, जो सरकार से ज्यादा प्रभावशाली बनी हुई हैं. 2675 टैंक, भारी आर्टिलरी और नौसेना (18,000 सैनिक) सक्रिय हैं. होर्मुज स्ट्रेट में नौसैनिक खदानें और छोटे जहाज अभी प्रभावी हैं.
– सबसे बड़ी ताकत बैलिस्टिक मिसाइलों जखीरा तो है ही और ड्रोन भी हैं. ईरान की मिसाइल बनाने की क्षमता भी बरकरार है, लिहाजा वो इसे जारी रखे हुए है.
– प्रॉक्सी नेटवर्क बना हुआ है. हिजबुल्लाह, हूती और अन्य गुट ईरान की “छाया सेना” हैं, जो सीधे हमलों से बचकर युद्ध को लंबा खींच रहे.





