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Defence News: मॉडर्न डे वॉरफेयर में एयर पावर का रोल काफी अहम है. जिस देश के पास जितना एडवांस फाइटर जेट्स, ड्रोन सिस्टम और मिसाइल्स हैं, वो उतना ही ताकतवर है. अमेरिका, रूस, चीन आदि की वायुसेना काफी स्ट्रॉन्ग और टेक्नोलॉजिकल साउंड है. इंडियन एयरफोर्स की गिनती भी दुनिया के ताकतवर वायुसेना में होती है. हाल के कुछ सालों में IAF ने अपनी ताकत को नेक्स्ट लेवल तक ले जाने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं. इसमें हजारों-लाखों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है.
इंडियन एयरफोर्स ने Su-30MKI को अपग्रेड कर उसे राफेल फाइटर जेट्स के लेवल का लड़ाकू विमान बनाने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया है. (फाइल फोटो/Reuters)
भारतीय वायुसेना (IAF) के महत्वाकांक्षी ₹63000 करोड़ के ‘सुपर सुखोई’ आधुनिकीकरण कार्यक्रम को एक बड़ा तकनीकी पुश मिला है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड ‘विरुपाक्ष’ AESA रडार के प्रोटोटाइप निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. यह अत्याधुनिक रडार Su-30MKI लड़ाकू विमानों को 4.5 पीढ़ी के प्लेटफॉर्म में बदलने की रणनीति का केंद्रीय हिस्सा माना जा रहा है. DRDO की इलेक्ट्रॉनिक्स एवं रडार विकास स्थापना (LRDE) द्वारा विकसित इस रडार ने डिजाइन फेज को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है और अब इसका फुल स्केल प्रोटोटाइप तैयार किया जा रहा है. वर्ष 2025 के अंत में स्थापित असेंबली लाइन्स और प्रोडक्शन स्ट्रक्चर के जरिए अब रडार के हार्डवेयर का इंटीग्रेशन और जमीनी परीक्षण शुरू हो चुका है. यह प्रक्रिया रडार को फ्लाइट ट्रायल के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. ‘विरुपाक्ष’ रडार को डीआरडीओ के ‘उत्तम’ AESA रडार का एडवांस वर्जन माना जा रहा है, जिसे तेजस लड़ाकू विमान के लिए विकसित किया गया है और जो अब तक 125 से अधिक सफल ट्रायल फ्लाइट्स पूरी कर चुका है. हालांकि, Su-30MKI एक हेवी एयर सुपरियोरिटी फाइटर होने के कारण ‘विरुपाक्ष’ रडार का आकार, ऊर्जा क्षमता और इंटीग्रेशन प्रोसेस ‘उत्तम’ की तुलना में कहीं अधिक जटिल और उन्नत है.
भारतीय वायुसेना फिलहाल 259 से 272 Su-30MKI फाइटर एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल कर रहा है. (फाइल फोटो/Reuters)
400 किलोमीटर डिटेक्शन कैपेबिलिटी
इस रडार की सबसे बड़ी विशेषता इसमें इस्तेमाल की गई अत्याधुनिक GaN सेमीकंडक्टर तकनीक है. इसमें लगभग 2400 ट्रांसमिट/रिसीव (TR) मॉड्यूल लगाए गए हैं, जो पुराने गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) आधारित सिस्टम और वर्तमान में उपयोग में आ रहे रूसी N011M ‘बार्स’ (PESA) रडार की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली हैं. GaN तकनीक के कारण यह रडार अधिक ताकतवर सिग्नल ब्रॉडकास्ट कर सकता है, जबकि कम तापमान पर काम करता है. इससे न केवल इसकी कार्यक्षमता बढ़ती है, बल्कि टार्गेट पहचानने की दूरी भी लगभग 400 किलोमीटर तक पहुंचने का अनुमान है. इस जटिल प्रणाली के निर्माण के लिए डीआरडीओ ने घरेलू रक्षा और एयरोस्पेस कंपनियों के एक कंसोर्टियम के साथ साझेदारी की है. एस्ट्रा माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स लिमिटेड हाई-फ्रीक्वेंसी वाले GaN मॉड्यूल के उत्पादन का नेतृत्व कर रही है, जबकि लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) निर्माण और इंटीग्रेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. यह सहयोग भारत की रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को और मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
क्या है पावर ऑन टेस्ट
रडार के प्रारंभिक परीक्षण चरण (जिन्हें ‘फर्स्ट लाइट’ या पावर-ऑन टेस्ट कहा जाता है) फरवरी 2026 के अंत में शुरू हो चुके हैं. इन ट्रायल्स का उद्देश्य रडार की बीम स्टियरिंग सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करना और लिक्विड कूलिंग सिस्टम की क्षमता को जांचना है, ताकि हाई एनर्जी वाले मॉड्यूल से उत्पन्न गर्मी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सके. उड़ान परीक्षण से पहले रडार को कई सख्त जमीनी परीक्षणों से गुजरना होगा. इसके तहत Su-30MKI के नोज कोन पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कंपैटिबिलिटी (EMC) परीक्षण किए जाएंगे, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि नया रडार विमान के मौजूदा एवियोनिक्स सिस्टम के साथ बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के काम कर सके. साथ ही कुछ अन्य परीक्षण डीआरडीओ के हॉकर 800 जेट पर किया जा रहा है, जो एक फ्लाइट ट्रायल प्लेटफॉर्म के रूप में इस्तेमाल होता है.
नेक्स्ट फेज फ्लाइट ट्रायल
परियोजना के अगले चरण में पूर्ण पैमाने पर उड़ान परीक्षण शामिल हैं, जिनकी शुरुआत 2028 की शुरुआत में होने की संभावना है. इसके लिए विशेष रूप से संशोधित सुखोई-30 एमकेआई विमान का उपयोग किया जाएगा, जिसे एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट (ASTE) ऑपरेट करेगा. इन परीक्षणों के दौरान पायलट वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में रडार की क्षमता का आकलन करेंगे, जिसमें एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक करना और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध स्थितियों में प्रदर्शन शामिल होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि ‘विरुपाक्ष’ एईएसए रडार ‘सुपर सुखोई’ कार्यक्रम की रीढ़ साबित होगा. इसके शामिल होने के बाद भारतीय वायुसेना न केवल स्टील्थ टार्गेट का बेहतर तरीके से पता लगा सकेगी, बल्कि जैमिंग जैसी चुनौतियों का भी प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकेगी. साथ ही यह लंबी दूरी की स्वदेशी अस्त्र MK-III मिसाइल जैसे हथियारों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करेगा. यह अपग्रेड Su-30MKI को 2050 के दशक तक भारतीय वायुसेना की प्रमुख ताकत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और देश की एयर डिफेंस कैपेबिलिट वायु सुरक्षा क्षमता को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें





