आग उगलते सूरज की 24 घंटे निगरानी, चांद पर जाने से पहले क्यों डरा हुआ है NASA? आर्टेमिस 2 मिशन की इनसाइड स्टोरी


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NASA Artemis II Launch: नासा का आर्टेमिस 2 मिशन 1 अप्रैल 2026 को चांद के लिए उड़ान भरेगा. इस मिशन में अंतरिक्ष यात्री 50 साल बाद पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से बाहर जाएंगे. सूरज से निकलने वाले खतरनाक रेडिएशन और सोलर पार्टिकल्स से क्रू को बचाने के लिए नासा 24 घंटे निगरानी रख रहा है. मार्स रोवर और एडवांस सेंसर्स की मदद से इस अदृश्य खतरे से निपटने की तैयारी की गई है.

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नासा की 24 घंटे की चौकसी, चांद पर जाने से पहले क्यों डरा रहा है सौर तूफान? (AI Photo)

NASA Moon Mission: नासा का आर्टेमिस 2 मिशन अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है. 1 अप्रैल 2026 को चार अंतरिक्ष यात्री चांद की ओर उड़ान भरेंगे. यह पिछले 50 से ज्यादा सालों में पहली बार होगा जब इंसान पृथ्वी के सुरक्षित चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) को छोड़कर गहरे अंतरिक्ष में कदम रखेगा. लेकिन इस ऐतिहासिक सफर के बीच एक बहुत बड़ा और अदृश्य दुश्मन खड़ा है, और वह है हमारा अपना सूरज. नासा ने इस मिशन के लिए सूर्य की 24 घंटे निगरानी शुरू कर दी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि सूरज से निकलने वाले सोलर एनर्जेटिक पार्टिकल्स (SEPs) अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं.

क्या सूरज के ये अदृश्य कण अंतरिक्ष यात्रियों को मार भी सकते हैं?

आर्टेमिस 2 मिशन करीब 10 दिनों का होगा, जिसमें अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा के चारों ओर चक्कर लगाकर वापस लौटेंगे. इस दौरान सबसे बड़ा खतरा ‘सोलर फ्लेयर्स’ और ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ से है. जब सूरज में कोई बड़ा धमाका होता है, तो वह बहुत तेज गति से चार्ज्ड पार्टिकल्स छोड़ता है. नासा के मुताबिक, ये पार्टिकल्स इतने शक्तिशाली होते हैं कि ये स्पेसक्राफ्ट की मोटी दीवारों को भी चीर सकते हैं. अगर ये इंसान के शरीर में प्रवेश कर जाएं, तो डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं और गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं. इसी खतरे को भांपते हुए नासा ने ‘मून टू मार्स स्पेस वेदर एनालिसिस ऑफिस’ बनाया है, जो हर पल अंतरिक्ष के मौसम पर नजर रखता है.

मंगल ग्रह पर बैठा रोवर कैसे बनेगा चांद के यात्रियों का बॉडीगार्ड?

हैरानी की बात यह है कि चंद्रमा पर जाने वाले यात्रियों को बचाने में मंगल ग्रह पर मौजूद ‘परसेवरेंस रोवर’ बड़ी भूमिका निभा रहा है. नासा ने एक बहुत ही अनोखा तरीका निकाला है. मंगल ग्रह की स्थिति ऐसी है कि वहां से सूर्य का वह हिस्सा भी दिखता है जो पृथ्वी से ओझल होता है. परसेवरेंस रोवर के ‘Mastcam-Z’ कैमरे सूर्य के उन धब्बों (Sunspots) की तस्वीरें लेते हैं, जो पृथ्वी की तरफ घूमने में करीब दो हफ्ते का समय लेते हैं. इससे वैज्ञानिकों को 14 दिन पहले ही पता चल जाता है कि आने वाले समय में कोई बड़ा सौर तूफान आने वाला है या नहीं. यह एडवांस चेतावनी अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है.

क्या होता है जब स्पेसक्राफ्ट के अंदर बजता है रेडिएशन अलार्म?

आर्टेमिस 2 के ओरियन स्पेसक्राफ्ट में ‘हेरा’ (HERA) नाम के छह हाई-टेक सेंसर्स लगाए गए हैं. ये सेंसर्स हर सेकंड रेडिएशन के लेवल को मापते हैं. अगर अचानक सूरज की तरफ से आने वाले खतरनाक कणों की संख्या बढ़ती है, तो स्पेसक्राफ्ट के अंदर एक तेज अलार्म बजने लगेगा. यह अलार्म सुनते ही अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेनिंग दी गई है कि वे तुरंत ‘इम्प्रोवाइज्ड स्टॉर्म शेल्टर’ तैयार करें. वे स्पेसक्राफ्ट के अंदर मौजूद सामान और भारी वजन का इस्तेमाल करके एक सुरक्षा घेरा बनाएंगे. यह दीवार की तरह काम करेगा और उन्हें रेडिएशन की सीधी मार से बचाएगा.

सौर तूफान की रफ्तार और उससे बचने की असली चुनौती क्या है?

सूरज से निकलने वाले ये कण प्रकाश की गति के काफी करीब चलते हैं. नासा का कहना है कि धमाके के बाद ये एक घंटे से भी कम समय में स्पेसक्राफ्ट तक पहुंच सकते हैं. यानी वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों के पास संभलने का वक्त बहुत कम होता है. इसीलिए नासा ने सूर्य के चारों ओर सैटेलाइट्स का एक पूरा नेटवर्क तैनात किया है. ये सैटेलाइट्स और मार्स रोवर का डेटा मिलकर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार कर रहे हैं, जो आर्टेमिस 2 मिशन को सुरक्षित बना सके. अंतरिक्ष में यह जंग इंसान की तकनीक और कुदरत की ताकत के बीच है.

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Deepak Verma

दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्‍य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़…और पढ़ें



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